40 वर्षीय पुराने पंचांग

पूज्य पिताजी स्वर्गीय राजज्योतिषी वैदिक पंडित पीतांबर दत्त बिजल्वाण ज्योतिषरत्न, दैवज्ञभूषण, आयुर्वेदाचार्य के आशीर्वाद से मुझे समय-समय पर कई सिद्ध महात्माओं-विद्वानों एवं हितैषियों द्वारा ज्योतिष कार्य एवं पंचांग संपादन हेतु मार्गदर्शन-उत्साहवर्धन किया जाता रहा है। संवत् 2060 से श्री सिद्धिदात्री पंचांग का संपादन एवं प्रकाशन कार्य हो रहा है तथा उससे पूर्व के पंचांगों की आवश्यकता ज्योतिष का कार्य करने वाले विव्दान् पंडित वर्ग को प्रायः होती रहती है। इस कमी को पूरा करने के लिए संवत् 2041 से संवत् 2100 तक का 60 वर्ष का श्री पीतांबर पंचांग एवं फलित ज्योतिषसार 1776 पृष्ठ का ग्रंथ प्रकाशित कर चुका हूं । अब संवत् 2041से पूर्व के पंचांगों का प्रकाशन वेबसाइट द्वारा करना प्रारंभ किया है। उक्त पंचांग प्रकाशन श्रृंखला में संवत् 2001 से संवत् 2040 का 40 वर्षीय पंचांग ज्योतिषफल वेबसाइट के पंचांग शीर्षक वाले पृष्ठ में दिया जा रहा है ताकि पंडित वर्ग को पुराने पंचांग आसानी से उनके मोबाइल में ही वेबसाइट द्वारा उपलब्ध हो सकें । पुराने पंचांग के प्रकाशन के लिए मुझे वेद के विद्वान

आचार्य डॉक्टर शैलेंद्र उनियाल राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान विश्वविद्यालय देवप्रयाग

द्वारा उत्साहित किया गया इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं।

यहां प्रकाशित पुराने पंचांग में सूर्य उदय सूर्यास्त एवं स्टैंडर्ड अंतर नहीं दिया गया है । अतः इष्टकाल साधन करने हेतु सूर्य उदय की नीचे दी गई सारणी अंग्रेजी मास व अंग्रेजी तारीख से अलग से दी गई है। इस सारणी द्वारा पुराने पंचांगों के सूर्योदय एवं स्टैंडर्ड अंतर अंग्रेजी तारीख द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । यदि अभीष्ट तारीख के सूर्योदय के समय में उसके आगे लिखे स्टैंडर्ड अंतर मिनटों को जोड़ दिया जाए तो वह भारतीय स्टैंडर्ड टाइम में सूर्योदय प्राप्त हो जाता है । जो लोग पुराने गणित का अभ्यास करने वाले हैं वह स्थानीक काल के सूर्योदय से ही इष्टकाल बनाया करते हैं । अतः स्टैंडर्ड अंतर मिनट एवं स्थानिक सूर्योदय पूर्व की भांति ही दिया गया है। क्योंकि पंचांग में लिखे गए सूर्योदय एवं स्टैंडर्ड अंतरों में सेकंडो का त्याग कर दिया जाता है इसलिए साधित इष्टकाल में दो- तीन पल का अंतर कहीं-कहीं संभव है ।

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विक्रम संवत 2001 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2002 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2003-2004 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2005-2006 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2001-2002-2003-2004-2005के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट )

विक्रम संवत 2007-2008 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2006-2007-2008-2009के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट )

विक्रम संवत 2009-2010-2011 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग )

विक्रम संवत 2010-2011के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट )

विक्रम संवत 2001-2002-2003-2004-2005-2006-2007-2008-2009-2010-2011 के सूर्य आदि ग्रहों का भा.स्टैं. टाइम में राशिचार

विक्रम संवत 2012-2013-2014-2015-2016-2017-2018-2019-2020 के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट

विक्रम संवत 2012-2013-2014-2015-2016-2017-2018-2019-2020 के सूर्य आदि ग्रहों का भा.स्टैं. टाइम में राशिचार

विक्रम संवत 2021-2022-2023-2024-2025-2026-2027-2028-2029 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग

विक्रम संवत 2021-2022-2023-2024-2025-2026-2027-2028-2029 के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट

विक्रम संवत 2021-2022-2023-2024-2025-2026-2027-2028-2029 के सूर्य आदि ग्रहों का भा.स्टैं. टाइम में राशिचार

विक्रम संवत 2030-2031-2032-2033-2034-2035 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग

विक्रम संवत 2030-2031-2032-2033-2034-2035 के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट

विक्रम संवत 2030-2031-2032-2033-2034-2035 के सूर्य आदि ग्रहों का भा.स्टैं. टाइम में राशिचार वक्र मार्ग उदय अस्त

विक्रम संवत 2036-2037-2038-2039-2040 के (श्री सिद्धिदात्री पंचांग के ) श्री पीताम्बर पंचांग

विक्रम संवत 2036-2037-2038-2039- 2040 के भारतीय स्टैंडर्ड टाइम प्रातः 5 बज कर 30 मिनट के दैनिक ग्रह स्पष्ट

संवत 2036-2037-2038-2039-2040 तक का सूर्य आदि ग्रहों का भा.स्टैं. टाइम में राशिचार वक्र मार्ग उदय अस्त

ऊपर लिखे हुए को हल्के से दबाने से 40 वर्ष का पंचांग एवं 29 वर्ष के ग्रह स्पष्ट एवं 29 वर्ष के ग्रहों के राशि चार उदय अस्त वक मार्ग मोबाइल में डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। उनको डाउनलोड करके देख लेना चाहिए। उक्त 40 वर्ष के पंचांग की संबंधित सामग्री की पुनः जांच किया जाना अभी शेष है।

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आनंद संवत्सर का निर्णय

संवत्सर निर्णय<

- प्रभव आदि 60 संवत्सरों का निर्णय मध्यम गुरु के कुंभ राशि से आरंभ कर किया जाता है अर्थात मध्यम गुरु यदि कुंभ राशि में है तो प्रभव संवत्सर मीन राशि में विभव संवत्सर एवं मेष राशि में शुक्ल संवत्सर होगा ।इसी क्रम में मध्यम गुरु के मेष राशि में आने पर विजय संवत्सर एवं वृष राशि में जय संवत्सर तथा मध्यम गुरु केेेे मिथुन राशि में मन्मथ संवत्सर होगा । आगे इसी क्रम में जब मकर राशि में मध्यम गुरु है तो आनंद संवत्सर होता है तथा कुंभ राशि के मध्यम गुरु में राक्षस नाम का संवत्सर होगा । वर्तमान समय में लगभग सभी पंचांग संशोधित नवीन गणित  चित्रापक्ष से  ही निर्मित किए जा रहे हैं । चित्रापक्ष नवीन संशोधित गणित के अनुसार  30 मई 2020 को  मध्यम गुरु ने मकर राशि में प्रवेश किया था एवं आगे 27 मई 2021 को मध्यम गुरु कुंभ राशि  में आएगा । संवत 2078 के चैत्र शुक्ल प्रतिपदा  मंगलवार को  केतकी अहर्गण 3660 है इससे मध्यम गुरु  9 राशि 26 अंंश 21 कला 14 विकला आता है। अतः गणना सेे स्पष्ट है कि मध्यम गुरु  के मकर राशि में स्थित होने से संवत 2078 में आनंद संवत्सर है । सूर्य सिद्धांत की  गणना से मध्यम गुरु 10 राशि 01 अंश  आता है अतः  प्राचीन गणित सूर्य सिद्धांत के अनुसार कुंभ राशि में मध्यम गुरु के स्थित होने से राक्षस नाम का संवत्सर होता है । अतः सिद्ध है कि  संशोधित चित्रापक्ष गणना के अनुसार संवत 2078 में आनंद नाम का संवत्सर है क्योंकि लगभग सभी पंचांग संशोधित नवीन चित्रापक्ष गणना से ही  प्रकाशित किए जा रहे हैं अतः संवत्सर भी संशोधित गणना के अनुसार ही लिया जाना चाहिए ना कि सूर्य सिद्धांत की गणना के अनुसार । यस्मिन पक्षे यत्र काले येन दृगगणितैक्यकम दृश्यते तेनपक्षेण कुर्यातिथ्यादि निर्णयम्।। वशिष्ट जी के उक्त वचन से स्पष्ट है कि दृगगणित द्वारा ही पंचांग संबंधी निर्णय लिया जाना चाहिए । अतः संवत् 2078 में आनंद संवत्सर वर्षपर्यंत अनुष्ठान आदि के संकल्प में कहा जाएगा। काशी के श्री ह्रृषीकेश पंचांग तथा श्री महावीर पंचांग एवं श्री ऋषिकेश पंचांग का उल्लेख करते हुए श्री बद्रीनाथ वेद वेदांग संस्कृत महाविद्यालय जोशीमठ के ज्योतिष विभाग के ज्योतिष प्रवक्ता

डॉ प्रदीप सेमवाल

जो कि सुप्रसिद्ध अनुसूया मंदिर मंडल जिला चमोली के मुख्य पुजारी भी हैं ने उपरोक्त पंचांग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि संवत 2078 में आनंद नाम का संवत्सर है।

आनंद संवत्सर को लुप्त संवत्सर कहना अशास्त्रीय -

मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ में लिखा है कि-“ गोजाsअंत्य कुंभेतरभेsतिचारगो नो पूर्वराशिं गुरु रेति वक्रितः। तदा विलुप्ताबद्व इहातिनिंदितः शुभेषु रेवासुर निम्नगांन्तरे ।।यदि मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु एवं मकर राशियों में अतिचार करने वाला गुरु यदि वक्री होकर पुनः उसी राशि में नहीं लौटता तो वह संवत्सर लुप्त संवत्सर होता है । पुनः लिखा है कि मेषे वृषे झषे कुम्भे यद्दतीचारगो गुरूः।न तत्र काल लोपः स्यादित्याह भगवान्यमः।।मेष वृष कुंभ और मीन राशियों में अतिचार करने वाला गुरु वक्री होकर पुनः पूर्व राशि में नहीं लौटता तब वह संवत्सर लुप्त नहीं कहा जाता। इस वर्ष संवत 2077 के अंतिम पक्ष चैत्र कृष्ण पक्ष नवमी सोमवार तदनुसार दिनांक 5 अप्रैल 2021 को रात्रि 12:24 पर गुरु अतिचार करके कुंभ राशि में आया है और संवत 2078 में भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी मंगलवार को तदनुसार दिनांक 14 सितंबर 2021को वक्री होकर पुनः मकर राशि में दिन के 2:21 पर प्रवेश कर रहा है। मध्यम गुरु कभी अतिचार नहीं करता है क्योंकि मध्यम गुरु की गति समान रहती है तथा अतिचार की गणना स्पष्ट गुरु से होती है क्योंकि स्पष्ट गुरु की गति घटती बढ़ती रहती है। यहां दो बातें विशेष रुप से ध्यान देने योग्य है एक तो यह कि लुप्त संवत्सर का निर्णय स्पष्ट गुरु से होता है तथा विभव आदि संवत्सर का निर्णय मध्यम गुरु से होता है दूसरा यह कि कुंभ रााशि में अतिचार कर आए हुए गुरु के पुनः वक्री होकर मकर राशि में प्रवेश करने से लुप्त संवत्सर नहीं है। दूसरा कुंभ राशि में अतिचार कर आए हुए गुरु से लुप्त संवत्सर नहीं माना जाता है । अतः शास्त्र के दोनों वचनों से लुप्त संवत्सर नहीं होना सिद्धध है । जो पंचांगंकर्ता आनंद संवत्सर को लुप्त संवत्सर कह रहे हैं वह नितांत भ्रांत हैं क्योंकि संवत्सर एवं लुप्त संवत्सर दोनों के निर्णायक तत्व अलग-अलग हैं। एक का निर्णय मध्यम गुरु से होता है तो दूसरे का निर्णय स्पष्ट गुरु से होता है। लुप्त संवत्सर का अभिप्राय संवत्सर का लोप होना नहीं बल्कि संवत्सर की संज्ञा है और उस संवत्सर में शुभ कार्यों के करने का निषेध है। इन भ्रांत पंचांगकार ने वास्तव में ऐसा कुतर्क दिया कि इनका तर्क इनकी ही बात से कट जाता है। यदि इनके तर्क को सही मानकर आनंद संवत्सर को लुप्त मान लिया जाए तो शुभ कार्यों का निषेध किस वर्ष में करेंगे ? क्योंकि वह आनंद संवत्सर तो इनके हिसाब से लुप्त हो चुका है और पंचांग में वह वर्ष है ही नहीं जिसे शुभ कार्यों के लिए शास्त्र में निषिद्ध कहा गया है तो शुभ कार्यों का निषेध किस वर्ष मे किया जाएगा तथा शास्त्र का निषेधात्मक वाक्य निरर्थक हो जाएगा । क्योंकि शास्त्र का कोई वाक्य निरर्थक या निशप्रयोजक नहीं होता है। अतः ना तो गणित से और ना ही शास्त्र व्यवस्था से आनंद संवत्सर लुप्त संवत्सर है। लुप्त संवत्सर का अभिप्राय यह नहीं है कि वह संवत्सर लोप हो गया है बल्कि यह संवत्सर की एक संज्ञा है । विशिष्ट नाम दिया गया है और उक्त लुप्त संवत्सर में धार्मिक कृत्यों अनुष्ठान के लिए मूहुर्तों का निषेध कहा गया है तथा उसका निराकरण भी शास्त्र में दिया गया है। अतः धर्म शास्त्र के अनुसार और गणित के अनुसार दोनों प्रकार से संवत 2078 आनंद नामक संवत्सर है। यद्यपि शास्त्र में गुरु के अतिचार की राशियों में मतभेद है किंतु एक बात लगभग सभी में लिखी है कि यदि गुरु अतिचार कर पूर्व राशि में लौटता है तो वह वर्ष लुप्त संवत् नहीं होता है । अतिचारगतो जीवस्तं राशिं नैति चेत्पुनः। लुप्त संवत्सरो ग्येयो गर्हितः सर्वकर्मसु।।--व्यवहार समुच्चय यदि दृग्गणित के पंचांगकर्ताओं ने सूर्य सिद्धांत के आधार पर इसी प्रकार आगे संवत्सर का क्रम रखा तो संवत 2088 अर्थात अगले 10 साल तक यह अंतर चलेगा। यह वशिष्ठ जी ,कश्यप जी ,व्यास जी, पराशर जी व अन्यों ने कहा है तथा मुहूर्त चिंतामणि में भी यही लिखा है । यहां उपरोक्त स्थिति में गुरु पूर्व राशि में वक्री होकर वापस आया है अतः आनंद संवत् लुप्त संज्ञक नहीं है।

संवत्सर का फल

कुछ लोग शास्त्र के विरुद्ध यह कह रहे हैं की वर्तमान में जो महामारी का प्रभाव है इससे यह सिद्ध हो रहा है कि यह आनंद नाम का संवत्सर नहीं बल्कि राक्षस नाम का संवत्सर है । आश्चर्य है कि यह लोग येन केन प्रकारेण राक्षस संवत्सर सिद्ध करना चाहते हैं जबकि शास्त्र के अनुसार यह कहीं नहीं लिखा है के आनंद संवत्सर या राक्षस संवत्सर में महामारी होगी । संवत्सर के नाम के आधार पर कभी भी संवत्सर का सही फलादेश नहीं किया जा सकता । यदि ऐसा होता तो वर्ष प्रवेश कुंडली जगत लग्न कुंडली आदि का प्रयोजन ही समाप्त हो जाता है । राक्षस संवत्सर को इस आधार पर की महामारी है सिद्ध करने वाले यह बताएं कि जब सन 1918 ईस्वी में अर्थात संवत 1976 में जबकि अंगिरा नाम का संवत्सर था विश्व में करोड़ों लोगों की महामारी से मृत्यु हुई थी उस समय भारतवर्ष में भी लगभग डेढ करोड़ के लगभग लोगों की मृत्यु हुई थी । शास्त्र में अंगिरा संवत्सर का फल कहीं यह नहीं लिखा है कि महामारी होगी या बड़ा विनाशकारी रोग होगा । इसी प्रकार संवत 2079 में आनंद संवत्सर को गणित की उपेक्षा कर मनमाने ढंग से राक्षस संवत्सर नहीं कहा जा सकता जबकि शास्त्र में आनंद संवत्सर में भी रोग होना लिखा हुआ है और इसी प्रकार राक्षस संवत्सर में भी लिखा हुआ है । शास्त्र के विरुद्ध गणना की उपेक्षा कर यह कहना कि वर्तमान में क्योंकि महामारी है इसलिए राक्षस संवत्सर है नितांत शास्त्र विरुद्ध है। यहां पर सप्रमाण आनंद संवत्सर एवं राक्षस संवत्सर का फल शास्त्र में क्या लिखा है यह बताते हैं। वर्ष प्रबोध ग्रंथ में लिखा है आनंद वर्ष का स्वामी गुरु, वर्षा अधिक ,सुभिक्ष ,चैत्र वैशाख में अन्न भाव तेज ज्येष्ठ, आसाढ में महावृष्टि ,श्रावण में महा मेघ ,भाद्रपद में खंड वर्षा ,गेहूं तेज , आस्विन में सस्ता रस अन्न वस्तु सम धातु अकरी कार्तिक में अकस्मात भय लोक पीड़ा मार्गशीर्ष में लोगों का दक्षिण दिशा में गमन पौष माघ में मेघवर्षा अन्न सस्त्ता फाल्गुन में धन्य अकरे। अब राक्षस संवत्सर का फल इस प्रकार लिखा है स्वामी शुक्र धन्य संग्रह उचित चैत्र में धूली वर्षा वैशाख जेस्ट में तेल अकरा जेष्ठ आषाढ़ में खारी खांड आदि वस्तु अकरी सावन में थोड़ा मेघ अन्न अकरा भाद्रपद में महामेघ अन्न भाव सम आश्विन में समता कार्तिक मे रोग से व्याकुलता मार्गशीर्ष आदि चार मास में धान्य भाव सम राजा सुखी प्रजा राजा का सम्मान करें फाल्गुन में अन्न सस्त्ता वृक्षों में नए पत्ते मार्ग सुखदाई सुभिक्ष। इसके नीचे संस्कृत में आनंद संवत्सर एवं राक्षस संवत्सर दोनों का फलादेश अक्षरसः पुस्तक से उदृत कर दिया गया है। इस प्रकार गणित एवं फलादेश दोनों से सिद्ध है कि वर्तमान संवत्सर आनंद संवत्सर ही है । इस वेबसाइट में गणित द्वारा भी आनंद संवत्सर सिद्ध किया गया है।

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Lord Ganesha